बोकारो में World War II की यादें , जापानी सेना से लड़ने के लिए अंग्रेजों ने यहां बनाया था प्रशिक्षण शिविर

झारखंड समाचार: बोकारो के चास में अंग्रेजों ने दूसरे विश्व युद्ध के समय आजाद हिंद फौज और जापानी सेना से लड़ने के लिए एक प्रशिक्षण स्थल बनाया था। यहां उन्हें जंगल में लड़ने की तालीम दी गई। 1943 से 1945 तक यह इलाका सैनिकों का ठिकाना बना रहा। अब यहाँ के अधिकतर इमारतें टूट चुकी हैं, लेकिन ये सभी दूसरे विश्व युद्ध की यादों को जिन्दा रखते हैं।

राममूर्ति प्रसाद, बोकारो। Jharkhand News: Bokaro News: अंग्रेजों ने दूसरे विश्व युद्ध के दौरान आजाद हिंद फौज और जापानी सेना से लड़ने के लिए बोकारो के चास में एक प्रशिक्षण स्थल बनाया था। बर्मा में जनरल स्टिलवेल की सेना की हार के बाद, 81 वेस्ट अफ्रीका डिवीजन के सैनिक उस प्रशिक्षण स्थल पर लाए गए थे।

यहां सैनिक लेते थे युद्ध का प्रशिक्षण

यहां उन्हें जंगल में लड़ने की तालीम दी गई। 1943 से 1945 तक यह जगह सैनिकों के लिए बनाई गई थी। 81वीं वेस्ट अफ्रीका डिवीजन के सैनिक यहां प्रशिक्षण पाते थे। जब वे इसमें माहिर हो गए, तो उन्होंने 1944 में दूसरे अराकान युद्ध में भाग लिया।

 

चास-पुरुलिया मार्ग पर 81 वीं वेस्ट अफ्रिकन डिविजन के सैनिक के लिए बनाया गया रेक्स ऑडिटोरियम।

प्रशिक्षण के लिए बने भवन हैं विश्वयुद्ध की यादों के गवाह

चास में प्रशिक्षण के समय बने ज्यादातर इमारतें अब टूट चुकी हैं, पर ये दूसरे विश्व युद्ध की यादों की तस्वीर हैं। पिंड्राजोरा में एक बड़ा कैंप तैयार किया गया था।

सैनिकों को पानी पीने के लिए अलग-अलग जगह पर टंकी बनाई गई थी। प्रशिक्षण वाली इमारतें दामोदर नदी के पास वाले पुल, पिंड्राजोरा, गवाई नदी, कुरा, और ओबरा जैसी जगह पर धनबाद-पुरुलिया सड़क पर हैं।

सैनिकों के मनोरंजन का भी था इंतजाम

पिंड्राजोरा के पास, पुरुलिया सड़क पर, सैनिकों के मनोरंजन के लिए एक बड़ा हॉल बनाया गया था जहां वे फिल्में देखते थे। अमेरिका के कुछ कलाकार भी वहां आए थे। गवई नदी के पास एक कब्रिस्तान और एक पानी साफ करने वाला प्लांट के बाकी हिस्से भी हैं।

वाहन साफ करने के लिए बने कुछ जगह अभी भी अच्छी हालत में हैं। ओबरा में बड़ा दफ्तर और एक छोटा अस्पताल था। 1948 में इन इमारतों में शिक्षक प्रशिक्षण स्कूल, छात्रावास और एक साधारण स्कूल खोल दिया गया। रामरुद्र स्कूल के पास अभी भी कुछ पुराने इमारत और कुआं है।

40 हजार सैनिकों को किया गया था प्रशिक्षित

चास में वेस्ट अफ्रीका वाले सैनिकों का एक कैंप था। चास से पिंड्राजोरा तक और पुरुलिया में प्रशिक्षण स्थल थे। चास में 81 वें अफ्रीका वाले डिवीजन के 40 हजार सैनिकों को प्रशिक्षण दिया गया था।

पांचवें भारतीय डिवीजन ने इन्हें प्रशिक्षित किया, और इसके सिर में मेजर जनरल ब्रिग्स थे। यह डिवीजन पहले भी अनेक जगहों पर लड़ चुका था।

एक पुस्तक के अनुसार, प्रशिक्षण के बाद इन सैनिकों को 14 वीं ब्रिटिश सेना में डाल दिया गया। 1944 में उन्होंने बर्मा में जापानी सैन्य पर हमला किया था।

जमीन पर लड़ने के लिए पांचवीं और 25 वीं इंडियन डिवीजन थी। पहले उन्होंने एक पहाड़ी पर कब्जा करने की कोशिश की, लेकिन उसमें असफल रहे। बाद में वे वेस्ट अफ्रीका वाले सैनिकों की मदद से उस पहाड़ी पर कब्जा किया।

इस डिवीजन में अलग-अलग अफ्रीकी देशों के सैनिक थे। वे 1943 में भारत आए थे। उन्होंने 1944 में बर्मा में एक महत्वपूर्ण युद्ध में भाग लिया, जिसमें उन्होंने जापानी सैन्य को हराया।

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